The Search

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Ashok Handoo 'Khamosh'
तलाश
(अशोक हण्डू ‘खामोश’)

वे मुझे तलाश रहे हैं

मैं भाग गया था ना

अपनी जान बचा कर

और अपनी बेटी की आबरू भी

अपनी बूढ़ी माँ को

कैसे भी

अपने कंधों पर बिठा कर

हांपते हुए ...

खेतों खेत, मुँह छिपाये ...

माँ की चूल्हे के पास वाली चौकी

वहीं छूट गयी थी

जिस पर बैठ कर वह

‘हाख्’ और उजले उबले चावल बनाती थी

और पीछे छूट गया था मेरा 'ज़ातुक' भी

उसी मकान में

जो मेरे भागते ही

धू धू करके जला था

कहते हैं मेरे भागने में कोई षड्यंत्र था ...

वे तब से मुझे तलाश रहे हैं

हर एक आगुन्तुक की आँखों में झाँक कर;

हर पुलिस वाले में मुझे देख रहे हैं

जो अपनी जान देकर भी

उनके मदरसे की रक्षा करता रहा

पर उनके झूठे प्रचार से घायल

अपनी सत्यनिष्ठा की रक्षा न कर पाया

वे मुझे खोज रहे हैं

हर तीर्थयात्री के जयकारों में

जो हर एक सूफ़ी की क़बर पर धागा बाँधना नहीं भूला

पर अपने मंदिरों की प्रतिष्ठा

बचाने का मूल-मंत्र भूल गया

वे खोज रहे हैं मुझे

हर उस ट्रक ड्राइवर की टीस में

जो उनके राशन के चावलों को लेकर

हफ्तों,

पस्सियों से ध्वस्त ‘हाइवे’ पर अटक कर रह जाता है

लेकिन ‘हाइवे’ पर अपनी दाल-रोटी बनाने के लिए

मिट्टी का तेल ‘ब्लॅक’ में खरीदता है

वे मुझे कहाँ नहीं तलाशते फिर रहे हैं

अपनी उस हार की खीज्ञ निकालने के लिए

जो मेरे बच कर भाग निकलने से हुई उनको

अनचुने सांसदों,

सुर्खियाँ तलाशते खबरियों

और कूटनीति खेलते हुए विद्यार्थियों

की कमज़ोरियों में

वे मुझे,

केवल मुझे तलाश रहे हैं

और मैं

उन सब से छुपते छुपाते

खंगाल रहा हूँ

चिर-सुलगती हुई चिता की तरह

उस जले हुए मकान की राख;

कि अस्थि-फूलों की तरह

कहीं मिल जाए ...

मेरी माँ की

चूल्हे के पास वाली चौकी का

कोई अधजला टुकड़ा ...

मेरे 'ज़ातुक' का

कोई अधजला पन्ना...

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‘हाख्’ – बड़े पत्तों वाली एक सब्ज़ी

'ज़ातुक' - जन्म-पत्री

Ashok Handoo ‘Khamosh’ was born in 1952 in a modest Kashmiri Pandit family in the heart of Srinagar city of Kashmir. He graduated from Kashmir University in 1970 and worked in the Indian Audit & Accounts Department till his retirement in 2012.
He inherited his interest in literature from his father Shri Ram Chand Handoo ‘Raaz’ who was a teacher and a poet in his own right.

‘Khamosh’ has been writing poems and prose, predominantly about Kashmiri culture and ethos since early 1970s. In addition to his mother tongue Kashmiri, he writes in Hindi, Urdu and English. His poems and stories have been published in various journals and are also available to readers on ‘Facebook’ and on his blog post
Comments
What a nostalgia. Beautiful!
Added By Vijay K Kaul
Aur mujhe lagta hai ki mere antas kee kisee veethika se adrishya hue ek sunder se chitra kee talaash aaj samapt ho gayi. How are you my dear friend? Subhash Premi (891228610 / 8178754937)
Added By SUBHASH PREMI
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