Vijay Malla- A Kashmiri poem

 
विजय मल्ला ----- एक श्रद्धापुष्प

दिव्य-ग्रह
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क्षमा कौल
 
साज़ फुट्य

आवाज़ गई न्यंग्लिथ

अनिगोट गव तू वुजमली न्यू

गाशि समन्दरस मंज़ गाशुकिस तु

कोरुन दरवाजु बंद

आस नु खोश असि सुइत्य

सदियव प्येठ आरू रोस छु नाखुश ...

मोअन ज़ि असिति छि करान वैर यलि आसान छु बरुन

लोल

करान छि बेहिसी यलि आसान छु थावुन हेस

दिवान छि कण्डोल यलि आसान छु थावुन कण

अणि ,ज़री ,कल्यी,फातिर तु चारी

असि ति क्याह गोमुत...

वनि कति लबोन...सु छु ग्यवान यांद्राज़िनिस दरबारस मंज़

राथताम औस असी सुइत्य

असि आअस नु पतुहीय मगर ...

अकी दोहु वुछुम सब्जी हेवान यि दिव्य -ग्रह

मे वुछुमस थली-थली .....

त्रावुन राग ........

बू राछुरिथ थावु सु दर्शुन.....दुर्लभ

त्रिज़गत पालय......पंपोशी मालय त्रावय नाल्य................
जन्म :17 जुलाई 1956 ; श्रीनगर,कश्मीर. देश- विभाजन के तुरंत बाद 1947 के पाकिस्तानी कबाइली - हमले के चलते परिवार के विस्थापित हो श्रीनगर चले आने के बावजूद बचपन में मुढ़- मुढ़ के अपने पैतृक गांव सीर (सोपोर) लौटकर वहां के चिनारों, खेत - खलिहानों और लोक- जीवन की जादुई फिज़ा मोहित करती रही.
कश्मीर विश्वविद्यालय से धूमिल पर एम्-फिल के बाद पटना विश्वविद्यालय से हिंदी की युवा-कविता पर पी एच-डी.

अब तक तीन पुस्तकें प्रकाशित और चर्चित.'समय के बाद' (डायरी.1997 ), 'बादलों में आग '(कविता-संग्रह,2000) और 'दर्दपुर' (उपन्यास, 2004). धर्मपाल शोधपीठ, भोपाल से 'आतंकवाद और भारत ' पुस्तिका (2012) प्रकाशित.'समय के बाद'पर केन्द्रीय हिंदी निदेशालय का राष्ट्रपति के हाथों सम्मान . जनसत्ता,वागर्थ ,वर्तमान-साहित्य,साक्षात्कार,उदभावना, शीराज़ा ,पूर्वग्रह .अक्षरा,दतावेज़,पर्वतराग,अन्यथा सहित हिंदी की सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानियां,समीक्षाएं प्रकाशित.'साक्षात्कार' के कश्मीर -केन्द्रित अंक का संपादन. विस्थापन,जलावतनी, आतंकवाद,साहित्य, संस्कृति ,रजनीति के समकालीन चरित्र ,मानवाधिकार, बाजारवाद के सवालों पर नियमित लेखन तथा देशभर में अलग -अलग जगहों विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में व्याख्यान.

कश्मीरी- काव्य से अनेक महत्वपूर्ण कवियों की प्रतिनिधि कविताओं के हिंदी में अनुवाद .अंग्रेज़ी के अलावा चुनिन्दा कविताओं का बांग्ला,तेलगु ,मराठी ,मलयालम,गुजराती, पंजाबी में अनुवाद प्रकाशित. कश्मीर केन्द्रित लेखों का एक संग्रह शीघ्र प्रकाश्य .सन 1990 से कश्मीर में जिहादी आतंकवाद और अलगाववाद के चलते अपने ही देश में शरणार्थी.
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