Pachtava

 

पछतावा
शिबन कृष्ण रैणा

हमारे पड़ोस में रहने वाले आनंदीलाल जी सत्तर के करीब होंगे। काया दुर्बल है, अत: चलने-फिरने में दिक्कत महसूस करते हैं। सुबह-सुबह जब मैं बच्चों के साथ अपने प्रांगण में बैड-मिंटन खेलता हूँ तो वे मुझे धीमी चाल से चहल-कदमी करते हुए दिखाई पड़ते है। सिर झुकाए तथा वितृष्ण नजरों को इधर-उधर घुमाते हुए वे भारी कदमों से मेरे सामने से निकलते हैं। क्षण-भर के लिए वे मुझ पर नजऱें गड़ाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। उनकी छोटी-छोटी आँखों में मुझे अवसाद की गहरी परतें जमी हुई नजर आती हैं। मैं सोचता हूँ कि शायद मंदिर जा रहे होंगे, किन्तु मंदिर के फाटक तक पहुँच जाने के बाद वे वापस मुड़ जाते हैं। मुझे वे ऐसे घूरते हैं मानो मैं कोई अपराधी होऊँ। उनकी तरफ देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे फटकार लगाकर मुझे कुछ कहना चाहते हों-

''काल की चाल को कौन थाम सका है भाई? योगी भी नहीं, महात्मा भी नहीं। अब भी वक्त है, चेत जा बाबू, चेत जा।“

उनकी नजरों की फटकार से बचने के लिए मैं अक्सर अपनी गर्दन मोड़ लेता हूँ और बच्चों के साथ खेल में लग जाता हूँ। आगे बढऩे के बाद वे एक बार फिर पीछे मुड़कर देखने लगते हैं, शायद यह जानने के लिए कि मैं भी उन्हें देख रहा हूँ कि नहीं।

हमारा यह मौन-संभाषण तब से चला आ रहा है जब से मैं और आनंदीलाल जी इस आवासीय कॉलोनी में रहने लगे हैं। हमारी ही लाइन में सात-आठ मकान पीछे उनका मकान है। एक दिन की बात है- आनंदीलाल जी अपनी दिनचर्या के मुताबिक मेरे मकान के सामने से निकले। दिनचर्या के तुमाबिक ही उन्होंने मेरे ऊपर नजऱें गड़ाई। उस दिन जाने ऐसा क्या हुआ कि वे देर तक मुझे देखते रहे। मैने भी नजरें हटाई नहीं बल्कि आँखों ही आँखों में उनको आदरभाव के साथ अभिवादन पेश किया। मुझे लगा कि मेरे इस अभिवादन को पाने की शायद वे बहुत दिनों से प्रतीक्षा कर रहे थे। क्षण-भर में अपरिचय, संकोच और औपचारिकता की सारी दीवारें जैसे ढह गईं। हाथ के इशारे से उन्होंने मुझे अपनी ओर बुलाया। मैं चाहता तो उनके पास नहीं जाता, मगर मुझे लगा कि वे मुझे कुछ कहना चाहते हैं। शायद कई दिनों से वे इस अवसर की तलाश में थे। मैं सड़क पार कर उनके पास पहुँचा। हाथ जोड़कर मैंने नमस्ते की। उन्होंने मेरे कन्धे पर अपना दायां हाथ रखा, जिसका मतलब था कि वे मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। इस बीच मेंने अनुभव किया कि उनकी छोटी-छोटी आँखों में अश्रु-कण तैरने लगे हैं। सांस उनकी फूली हुई है तथा टाँगें लरज रही हैं। इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वे बोल पड़े-

'तुम मास्टर हो, बच्चों को पढ़ाते हो ना?’

'हाँ-हाँ, लडकों को पढ़ाता हूँ। कॉलेज का प्रोफेस र हूँ।‘मैंने बड़ी शालीनता से निवेदन किया।

मेरी बात सुनकर जैसे उनकी वाणी खुल-सी गई।

दूसरा हाथ भी मेरे कन्धे पर रखकर वे बोले-

'प्रोफेसर साहब, अब भी वक्त है। चेत जाओ, चेत जाओ...’

मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया कि आनंदीलाल जी कहना क्या चाहते हैं। मैंने अन्दाज लगाने की खूब कोशिश की, किन्तु नाकामयाबी ही हाथ लगी। मेरी उलझन को वे भांप गये, बोले-

'घर आ जाओ कभी, सारी उलझन दूर हो जाएगी...।‘

मुझे लगा कि मैं पकड़ा जा रहा हूँ और मेरी ज्ञान-गरिमा चकना-चूर होती जा रही है। मैं मन-ही-मन इस बूढ़े आदमी की आत्मविश्वास एवं जीवन-सार से भरी हुई बातों की प्रशंसा करने लगा। क्या मनोवैज्ञानिक दृष्टि है ! क्या आत्म-बल है ! ....कहीं ऐसा तो नहीं कि जीवन के निचोड़ से निकले किसी बहुमूल्य रहस्य अथवा तथ्य को यह शख्स मुझे बताना चाहता हो। पर मुझे ही क्यों,....कॉलोनी में और भी तो इतने सारे लोग रहते हैं। मेरी चुप्पी उन्होंने तोड़ी, बोले-

'कोई मजबूरी नहीं है। मर्जी हो तो आ जाना। तुम्हारे लेख मैं अखबार में पढ़ता रहूता हूँ’ यह कहकर वे हल्की-सी मुझकराहट के साथ आगे बढ़ गए। उनके आखिरी वाक्य ने मुझे भीतर तक गुदगुदा दिया। मेरे अनुवादों और कहानियों को यह आदमी अपनी भाषा में लेख कहता है। कोई बात नहीं। पढ़ता तो है। पड़ोसी होने के रिश्ते को लेखक-पाठक के रिश्ते ने और बल प्रदान किया। मैं उसी दिन शाम के वक्त आनंदीलाल जी के घर चला गया। दरवाजा उन्होंने ही खोला। हल्की-सी मुस्कराहट के साथ उन्होंने मेरा स्वागत किया। हम दोनों आमने-सामने बैठ गए। काफी देर तक वे मुझे देखते रहे और मैं उन्हें। बीच-बीच में वे मामूली-सा मुस्करा भी देते। मौन-संभाषण जारी था। वे मुझे क्या चेताना चाह रहे थे, यह मैं आज जानना चाहता था। इस बीच मैंने महसूस किया कि वे बड़े सहज भाव से मेरी हर गतिविधि का अपनी अनुभवी नजरों से बड़ी गहराई के साथ अध्ययन कर रहे हैं। मुझे अपने मित्त-भाषी स्वभाव पर दया आई। आनंदीलाल जी अब भी संयत-भाव से मुझे तके जा रहे थे और मंद-मंद मुस्कराए जा रहे थे। तभी उनकी श्रीमती जी ने प्रवेश किया। पानी के दो गिलास हमारे सामने रखकर वह भीतर चली गई। जाते-जाते उसने अपने पति को कुछ इस तरह से घूर कर देखा मानो कह रही हो कि मुझे चाय बनाने के लिए मत कहना, मुझ में अब वह ताकत नहीं रही।

पानी पीकर गिलास को जैसे ही मैंने नीचे रखा, आनंदीलाल जी बोल पड़े-

'मन्दिर का मतलब मालूम है ?’

'मैं कुछ सकपकाया। अचानक ऐसा सवाल उन्होंने दे मारा था मुझ पर कि मैं सकते में आ गया। शब्दों को जमाते हुए मैंने कहा-

'जहाँ भगवान की मूर्ति रहती है, जहाँ भक्तजन पूजा-अर्चना करते हैं, वह पवित्र-स्थान मन्दिर कहलाता है।‘

'न-न, यह सही उत्तर नहीं है’ वे ऐसे बोले मानो मेरी प्रोफेसरी का बल निकालने पर तुले हुए हों ।

‘तो फिर ?’ मैंने पूछा।

'मन के अन्दर जो रहे, वह मन्दिर।‘ कहकर वे हल्का-सा हंस दिए।

मन्दिर की यह परिभाषा सुनकर मेरे विस्मय की सीमा नहीं रही। सचमुच, इस परिभाषा में दम था। वे एक बार फिर मुस्करा दिए मुझे देखकर, शायद यह सोचकर कि उन्होंने मुझे भिड़ते ही चित कर दिया था। मैंने पाया कि उनके चेहरे पर विजयोल्लास झलक रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ गई। सोचने लगा कि यदि इन्होंने और कोई ऐसा ही निरुत्तर करने वाला प्रश्न ठोंक दिया तो मेरी प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है। मैंने विनत होकर पूछा-

'वह आप चेत जाने की बात कह रहे थे ना।‘

'हां-हां कह रहा था, मगर पहले मेरे एक और प्रश्न का जवाब दो।‘

मैं आनंदीलाल जी की तरफ जिज्ञासाभरी नजरों से देखने लगा। मुझे लगा कि वे इस वक्त सचमुच यक्ष बने हुए हैं।

'यह बताओ जीवन में गहन पछतावा कब होता है ?’

प्रश्न कोई कठिन नहीं था। मैंने तत्काल उत्तर दिया-

'गलत काम करने पर पछतावा होता है।‘

'नहीं, इस बार भी तुम सही जवाब नहीं दे सके।‘

'तो सही जवाब क्या है ?’ मैंने झुंझलाते हुए कहा।

उन्होंने लम्बी-गहरी सांस ली। इधर-उधर नजरें घुमाई और कहने लगे-

'ममता किसी से मत रखो, अपनी संतान से भी नहीं। नहीं तो बुढ़ापे में पछताओगे। मैं तो पछता रहा हूँ। तुम चेत जाओ।‘

आनंदीलाल जी अब इस संसार में नहीं रहे। उनकी धर्मपत्नी का भी पिछले महीने स्वर्गवास हो गया। मैंने आनंदीलाल जी के अतीत को जानने की कोशिश की तो मालूम पड़ा कि अपने समय के प्रतिष्ठित व्यापारियों में उनकी गणना थी। अपनी लगन और मेहनत से उन्होंने पुस्तक-प्रकाशन का कारोबार जमाया था। जब बच्चे बड़े हो गए तो उनको अपना कारोबार संभलाकर खुद चालीस वर्षों की थाकन को उतारने की गर्ज़ से घर पर रहने लगे। लड़कों की शादियाँ हुई, घर-गृहस्थी नए आयाम और नए विस्तार लेती गई। कारोबार भी फैलता गया और एक दिन नौबत यह आ गई कि कारोबार का बंटवारा हो गया। तीनों लड़के अलग हो गए और अलग-अलग रहने लगे। आनंदीलाल जी और उनकी पत्नी इस संसार में अकेले रह गए और उनके साथ रह गई उनके अतीत की यादें, जिन यादों को अपने सीने में संजोए जाने कितनी रातें उन्होंने करवटें बदल-बदल कर काटी होंगी, इसका अनुमान मैं अच्छी तरह लगा सकता हॅँ।

*Raina,Shiben Krishen MA(Hindi&English),PhD;Professor/Writer;
Born: April22,1942 Srinagar(J&K);
Education: J&K,Rajasthan and Kurukshetra Univs;Head Hindi Dept.Govt Postgraduate College, Alwar;Sought voluntary retirement from Principalship and joined Indian Institute of Advanced Study,Rashtrapati Nivas, Shimla as Fellow to work on Problems of Translation(1999-2001).
Publications: 14 books including Kashmiri Bhasha Aur Sahitya(1972), Kashmiri Sahitya Ki Naveentam Pravrittiyan(1973), Kashmiri Ramayan:Ramavtarcharit(1975 tr.from Kashmiri into Hindi), Lal Ded/Habbakhatoon-monographs tr.from English(1980), Shair-e-Kashmir Mehjoor(tr.1989); Ek Daur(Novel tr.1980) Kashmiri Kavyitriyan Aur unka Rachna Sansar(1996 crit); Maun Sambashan(Short stories 1999); Awards: Bihar Rajya Bhasha Vibagh, Patna 1983; Central Hindi Directorate 1972, Sauhard Samman 1990; Rajasthan Sahitya Academy Translation Award (1998) Bhartiya Anuvad Parishad Award(1999); Titles conferred:Sahityashri,Sahitya Vageesh, Alwar Gaurav, Anuvadshri etc.
Address: 2/537(HIG) Aravali Vihar,Alwar 301001, India